बुधवार , भाद्र ३, २०८३
(क) विषय परिचय
अवधी भाषा के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी के जनम जयंती के अवसर पर हर बरिस अवधी भाषा दिवस मनावा जात है। कवनो भाषा के सम्मान, संरक्षण अउ प्रचार-प्रसार खातिर ओकर विशेष दिवस मनावे के परंपरा रहत है। ओही तरह अवधी भाषा दिवस भी सावन शुक्ल सप्तमी के पावन तिथि पर मनावा जात है, जवन गोस्वामी तुलसीदास जी के जनम दिवस मानल जात है।
ई दिवस खाली तुलसीदास जी के स्मरण मात्र नाय, बल्कि अवधी भाषा, साहित्य अउ भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के गौरव के रूप में भी मनावल जात है। तुलसीदास जी अपने अमर ग्रंथ श्रीरामचरितमानस द्वारा अवधी भाषा के विश्वभर में प्रतिष्ठा दिलाइन। एह कारण उनकर जनम जयंती अवधी भाषा दिवस के रूप में विशेष महत्व रक्खत है।
(ख) तुलसीदास जी के जनम तिथि अउ जनम स्थान
गोस्वामी तुलसीदास जी के जनम विक्रम संवत् १५८९ के सावन शुक्ल सप्तमी, शुक्रवार के दिन भवा मानल जात है। कुछ विद्वान एह तिथि के ईस्वी संवत् से भी जोड़त हैं, लेकिन भारतीय परंपरा में उनकर जनम तिथि चंद्र पंचांग के आधार पर ही निश्चित मानल जात है। तुलसीदास जी के जनम स्थान के संबंध में मतभेद जरूर है, लेकिन भारत सरकार अउ अधिकांश विद्वान उत्तर प्रदेश के सोरों (सूकरक्षेत्र) के सर्वमान्य जनमस्थान मानत हैं। उनकर पिता के नाम आत्माराम दुबे अउ माता के नाम हुलसी रहा।
(ग) तुलसीदास जी के बचपन
लोकमान्यता अनुसार तुलसीदास जी बारह महीना गर्भ में रहें अउ जनमतै "राम" नाम के उच्चारण किहिन। एह कारण उनकर बचपन के नाम रामबोला पड़िगा। अभुक्तमूल नक्षत्र में जनम होय के कारण बालक रामबोला के पालन-पोषण माता-पिता के बजाय दूसर लोगन द्वारा भवा। उनकर बचपन अत्यंत दुःख, अभाव अउ संघर्ष में बीतिस। बाद में गुरु अनंताचार्य से वैराग्य दीक्षा लिहिन अउ उनकर नाम तुलसीदास रखल गवा। लगभग सात बरिस के उमर में गुरु नरहरिदास द्वारा उनकर यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न भवा।
(घ) शिक्षा अउ अध्ययन
तुलसीदास जी सबसे पहिले अपने गुरु नरहरिदास से रामायण के कथा सुनिन। बार-बार कथा श्रवण करे से रामकथा उनकर हृदय में बसि गय। बाद में काशी में गुरु शेष सनातन के सान्निध्य में लगभग पंद्रह-सोलह बरिस तक संस्कृत व्याकरण, चारों वेद, छह वेदांग, ज्योतिष अउ हिंदू दर्शन के गंभीर अध्ययन किहिन। नरहरिदास अउ शेष सनातन आपस में मित्र रहें। यही अध्ययन आगे चलि के तुलसीदास जी के महान साहित्यिक व्यक्तित्व के आधार बना।
(ङ) विवाह अउ गृहत्याग
विद्वानन् के अनुसार तुलसीदास जी के विवाह विक्रम संवत् १६०४ में कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन गोण्डा जिला के नारायणपुर गाँव निवासी पंडित दीनबन्धु पाठक के पुत्री रत्नावली से भवा। एक दिन तुलसीदास जी हनुमान मंदिर में पूजा करे गय रहिन। ओही समय रत्नावली अपने भाई संग मायके चली गइं। जब तुलसीदास जी के ई बात पता चली, त ऊ रात में सरयू नदी पार करके ससुराल पहुँच गए।
रत्नावली द्वारा कहे गय वचन—
"एतना प्रेम यदि श्रीराम में होत, त भवसागर पार होइ जात।"
—उनकर जीवन के सबसे बड़ा मोड़ बनिगा। एह घटना के बाद तुलसीदास जी गृहत्याग करके संपूर्ण जीवन भगवान श्रीराम के भक्ति अउ लोककल्याण में समर्पित करि दिहिन।
(च) संत-संगति अउ भगवान श्रीराम के दर्शन
गृहत्याग के बाद तुलसीदास जी प्रयागराज पहुँचे अउ संन्यास ग्रहण किहिन। लोककथानुसार मानसरोवर में उनकर काकभुशुण्डि जी से दर्शन भवा। बाद में एक प्रेत के माध्यम से हनुमान जी के पता मिला। हनुमान जी के मार्गदर्शन पर तुलसीदास जी चित्रकूट पहुँचे। पहिले दुई बेर भगवान श्रीराम के दर्शन भवा, लेकिन उहैं पहिचान न पाइन। तिसरे अवसर पर भगवान श्रीराम बालक रूप में प्रकट भए अउ अपने हाथ से तुलसीदास जी के माथे पर चंदन लगाइन। चित्रकूट में भारद्वाज अउ याज्ञवल्क्य ऋषि के भी दर्शन भवा। ओकरे बाद तुलसीदास जी काशी वापस आ गए।
(छ) श्रीरामचरितमानस के रचना
काशी में तुलसीदास जी संस्कृत में काव्य रचना करे लागेन, लेकिन दिनभर लिखल पद रात में लुप्त होइ जात रहिन। ई क्रम आठ दिन तक चलिस। आठवें दिन भगवान शिव स्वप्न में दर्शन देके आदेश दिहिन कि जनभाषा अवधी में श्रीराम के चरित लिखव। जागे पर तुलसीदास जी के भगवान शिव अउ माता पार्वती के प्रत्यक्ष दर्शन भवा अउ उहै आदेश पुनः मिला। तब तुलसीदास जी अयोध्या पहुँचिन अउ विक्रम संवत् १६३१ के रामनवमी के दिन श्रीरामचरितमानस के रचना प्रारम्भ किहिन। लगभग दुई बरिस, सात महीना अउ छब्बीस दिन में ग्रंथ पूरा भवा। विक्रम संवत् १६३३ के मार्गशीर्ष मास में राम-विवाह के दिन सातवाँ काण्ड पूर्ण भवा। एकरे बाद तुलसीदास जी काशी आके भगवान विश्वनाथ अउ माता अन्नपूर्णा के समक्ष मानस के पाठ किहिन।
(ज) पंडितन के विरोध अउ श्रीरामचरितमानस के मान्यता
शुरू में काशी के कुछ विद्वान तुलसीदास जी के अवधी में काव्य रचना स्वीकार न किहिन। उनकर विरोध किहिन अउ ग्रंथ के नष्ट करे तक के प्रयास भवा। कहावत अनुसार जब ग्रंथ भगवान विश्वनाथ के मंदिर में राखल गवा, तब दूसरे दिन ओकर ऊपर "सत्यम् शिवम् सुन्दरम्" अंकित मिला। बाद में विद्वान मधुसूदन सरस्वती ग्रंथ के पढ़के बहुत प्रसन्न भए अउ प्रसिद्ध श्लोक लिखिन—
आनन्दकानने ह्यास्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः।
कविता-मञ्जरी भाति राम-भ्रमर-भूषिता॥
इसके बावजूद जब संदेह समाप्त न भवा, तब भगवान विश्वनाथ के समक्ष वेद, शास्त्र, पुराण अउ श्रीरामचरितमानस रखल गवा। दूसरे दिन मानस सबसे ऊपर रखल मिला। एह घटना के बाद विरोध समाप्त होइ गवा अउ तुलसीदास जी के व्यापक सम्मान मिला।
(झ) हनुमान चालीसा के रचना
लोकपरंपरा अनुसार एक समय मुगल बादशाह अकबर तुलसीदास जी के दरबार में बुलवाइन। जब तुलसीदास जी चमत्कार देखावे से मना किहिन, तब उहैं कैद कर दिहिन।
कारागार में रहत-रहत तुलसीदास जी हनुमान चालीसा के रचना प्रारम्भ किहिन। जनश्रुति अनुसार चालीसा पूर्ण होतै फतेहपुर सीकरी में असंख्य वानरन के उत्पात शुरू होइ गवा। तब अकबर तुल
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